Tuesday, October 7, 2008

जो ज़रूरी




आंसू मोती कैसे?
आंसू कीमती क्योंकर?

कहती है मां
संभाल कर रखो इनको
विदाई पे काम आएंगे।
कह कर मुस्कुराती हैं वो
और रूला जाती हैं वों।

पर आंसू मोती कैसे?
आंसू कीमती क्योंकर?
यह समझ नहीं पाती मैं।

लगते नहीं अच्छे ये बहते हुए
अंदर रखो या सोख जाओ इन्हें
यूं बहाते नहीं इन्हें
बुरा होता है ये
-लोग कहते हैं

पर भीतर क्यों पालूं इन्हें
क्यों सहेजूं इन्हें
आंसू मोती कैसे?
अब भी नहीं समझी मैं।

सबसे खूबसूरत फूलों के चुभते कांटों जैसे
आते बाहर चाीखते से
करते हल्का मन को
बचाते देवता होने से

इनके होने और जब हों, तो बहने पे
क्यों लगाऊं लगाम?
आंसू मोती क्यों मानूं मैं?
नहीं समझ पा रही हूं मैं।

आंसू की कीमत उन्हें सहेजने में कहां!
उनके बह चुकने पे है
सारी मान्यताएं और शिक्षाएं अधूरी
बकवास ही हैं इस बाबत

आंसू नहीं मोती
न ही कीमती कहो इन्हें
कीमती तो खुशी है और संतोष भी
इसे पालो
सहेजो इसे

पर आंसू तो
एक प्रकृति प्रदत्त उपहार
इंसान को इंसान बनाए रखने के लिए...

Monday, September 29, 2008

धूल झाड़ते हुए


कल किताबों से धूल झाड़ते हुए एक पर्ची गोद में गिर पड़ी। पता नहीं कब कहां से उतारी थी यह कविता। मगर, कितना कुछ कहती हैं ये पंक्तियां...!

ईसा मसीह
औरत नहीं थे
वरना
मासिक धर्म
11 बरस की उमर से
उन्हें ठिठकाए ही रखता
देवालय के बाहर।


कवि का नाम किसी को पता चले तो कृपया बताएं।

Saturday, September 27, 2008

मेरे बाजू वाली खिड़की


कब्रें

अपने होने का प्रमाण देती हैं
चलते फिरते लोगों में

कब्रें

फिर फिर दोहराती हैं
वही सच्चाई
कि सबको घुलना मिट्टी में

कब्रें

चुपचाप ही
इंसान सी
जीवित की तरह
सहती हैं धूप धुंआ अंधड़ पानी

कब्रें

बाईं ओर की खिड़की से झांकती सी
मुझमें,
कहती हैं
जीवन मृत्यु से बड़ा सत्य!


कब्रें

नाम की पट्टी ओड़े
मौत के बाद भी
ढोती हैं देह का दंश
सतत...सनातन...अंतहीन

Thursday, September 25, 2008

आहों पर बने सिंहासन


गुजरात पर जितना 'रोआ' जाए, कम है।

मेरे चारों ओर ऐसे महानुभावों की कतई कमी नहीं जो यह मानते हैं कि नरेंद्र मोदी गुजरात के भगवान साबित हुए हैं। उनके जैसा नेता (और भारतीय जनता पार्टी जैसी राजनीतिक पार्टी ) अब ईश्वर की फैक्ट्री में बनने बंद हो गए हैं। आज जो भी कुछ है गुजरात में, नरेंद्र मोदी की ही किरपा है। विकास के नए पैमाने स्थापित किए हैं। रोजगार के नए द्वार खोले हैं। वाह रे मोदी, गुजरात के ही नहीं राष्ट्र के लाल मोदी। हिंदुओं के तारणहार, पालनहार मोदी।

मेरा खून खौलता है। मगर, खौलता तो तेल भी है। आंच पर। होता क्या है? अंतत: तेल में पूरियां तल ली जाती हैं।

नानावती आयोग की रिपोर्ट की पहली किस्त आ गई है। गुजरात के दंगों पर आई इस पहली रिपोर्ट में कहा गया है कि साबरमती एक्सप्रेस को कथित दुघZटना नहीं थी बल्कि पूर्वनियोजित थी। ट्रेन को जलाने के लिए 140 लीटर डीजल का बंदोबस्त भी किया गया। ट्रेन जलाने का िक्लयर कट मकसद था- अराजकता फैलाना। कहा जा रहा है कि रिपोर्ट में मोदी को क्लीन चिट दी गई है।

इस क्लीन चिट पर भगवावादी नेता तो बल्ले बल्ले करेंगे ही, खुद को राष्ट्रवादी कहने वाले कथित हिंदू भी करेंगे।

अभी एक जानकार से इस रिपोर्ट की खबर के बाबत बात हुई तो उनका कहना था, कौन जाने क्या सच है? दंगों में कितने हिंदू मारे गए...साजिश थी या नहीं.. क्या पता..रिपोर्ट विपोर्ट की हकीकतें क्या पता नहीं आपको?

ऐसा कहने सोचने और बोलने वाले केवल यही एक होंगे, ऐसा नहीं। एक ही रिपोर्ट ने दो बातें कहीं हैं। एक, मोदी का इन दंगों से कोई लेना देना नहीं। दूसरी, साबरमती को जलाना साजिश था जिसका मकसद दंगें करवाना था। मगर, अपनी अपनी सहूलियत के अनुसार, हम रिपोर्ट के बिंदु को सच मानेंगे और दूसरे को झूठ।

....हां, खौलता तेल जब पांव पर गिरता है तो कदम रोक देता है। खौलता तेल जब चेहरे पर गिरता है तो नक्शा बिगाड़ देता है। ज्यादा दिनों तक तेल में पूरियां नहीं तली जा सकतीं।

Saturday, September 13, 2008

जो जीवित



उजड़ते मकान
उजड़ते अरमान
जीवित रही सिर्फ जिजीविषा
तुममें या फिर सिर्फ उसमें

बाढ़ के पानी ने किया सब समान (?)
समाप्त हर भेद
न कोई ऊंच
न कोई नीच

यह प्रकृति का कोप
या प्रकृति का फिर फिर व्याख्यान...

Podcast: सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविताओं का मेरा पॉडकास्ट

  हिन्दी के मशहूर कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविताओं को मैंने न्यूज18 हिन्दी के लिए पढ़ा था. यहां मैं पहली बार अपना हिन्दी पॉडकास्ट पोस्ट...