Thursday, May 15, 2008

`रजनीगंधा` अब महकती है


उसका नाम रजनीगंधा है। उसकी उम्र 39 साल है। अलवर के जिरका फिरोजपुर के पास उसका मायका है और हिजौरीगढ़ में उसका ससुराल है। वह महीनेवार अठारह सौ रूपए कमाती है। दो बेटियां हैं और एक बेटा है। बड़ी बेटी के हाथ पीले करने है, संभवत: इसी बरस जबकि छोटी बेटी पढ़ रही है। बेटा भी पढ़ रहा है और पुलिस में भर्ती होना चाहता है। रजनीगंधा की आंखों में चमक है और चेहरे पर संतोष भी। उसकी आंखों में अब सपने भी हैं जिनके पूरे होने की न सिर्फ वह कामना करती है बल्कि कोशिश भी करती है। मगर, पहले ऐसा नहीं था।

कभी रजनीगंधा देश के उन सैकड़ों स्त्री पुरूषों में से एक थी जिनकी जिंदगियां एक ऐसा काम करते-करते बीतती रही हैं जो न केवल गैर कानूनी है बल्कि एक सभ्य समाज के माथे पर कलंक की तरह है। भारत सरकार द्वारा मैला ढोने की प्रथा गैर कानूनी करार दे दी गई है। मगर आज भी देश के कई राज्यों में यह कथित ``प्रथा`` बिना किसी रोकटोक के जारी है।

जब बात हुई तब रजनीगंधा ने बताया कि उसके मायके में भी मैला ढोने का काम किया जाता है। उसकी पीढ़ियां यही काम करती आई हैं। रजनीगंधा 15 साल की थी जब उसकी शादी हुई। ससुराल में भी सभी मैला ढोने का काम करते हैं। उसने बताया, ``शादी से कुछ महीने पहले जब मां पहली बार अपने साथ काम पर ले गईं तो चक्कर आ गए थे। इसके बाद कई दिन कई बार उल्टी कर देती। मगर जाना पड़ता। क्योंकि, मां कहतीं कि ससुराल में तो जाना ही पड़ेगा। यह काम करना ही होगा।`` रजनीगंधा मैला ढोने का काम नहीं करना चाहती थी। लेकिन, पहले मां के दबाव में और फिर परिवार की आर्थिक जरूरत के मद्देनजर यह करना ही पड़ा। फिर उसने इसे नियति मान कर समझौता कर लिया।

दिन भर आधा दर्जन घरों से शौच सफाई कर उसे सिर पर तसले में भर कर दूर कहीं डाल कर आना होता। एक घर से कुल मिला कर अधिक से अधिक 25 रूपए की कमाई हो पाती। महीने भर में दो सौ रूपए तक की कमाई हो पाती। जिन घरों में वह शौच सफाई का काम करती, वह परिवार उनसे अछूतों सा व्यवहार करता। रजनीगंधा दलित समुदाय से है। वह वाल्मीकि है। ये परिवार उसे प्यास लगने पर ``उपर`` से पानी देते। एक दिन न आने पर पैसे काट लेते। ऐसे में मैला ढोने के संक्रमण के चलते अगर बीमार भी पड़ जाएंं और काम पर न जाएं तो रही सही कमाई भी हाथ से जाती रहती है। अलवर में रजनीगंधा जहां रहती हैं वहां ऐसे कई परिवार हैं जो यही काम करते हैं, पीढ़ियों से मैला ढोते आ रहे हैं। उसका कहना है कि वहां करीब दो सौ से ढाई सौ परिवार ऐसे हैं जो यही काम पीढ़ियों से करते आ रहे हैं।

मगर अब रजनीगंधा की जिंदगी बदल गई है। करीब आठ नौ महीने पहले अपनी जेठानी के माध्यम से वह सुलभ इंटरनेशनल नामक एक एनजीओ से जुड़ी है। उसकी जेठानी पांच साल पहले सुलभ से जुड़ी थी। अब रजनीगंधा सुलभ के अलवर स्थित सेंटर में सुबह आठ से सात बजे तक काम सीखती है, पढ़ाई करती है। महीने के अंत में अठारह सौ रूपए पगार के तौर पर मिलते हैं। रजनीगंधा से जब यह पूछा गया कि क्या वह अपनीे सहेलियों और पड़ोसियों को मैला ढोने के काम से निजात दिलवाएगी तो उसने उत्साह से हामी भरी और कहा, `` क्यों नहीं! जरूर ही मौका मिलने पर उन्हें जोड़ूंगी। अभी तो मैं खुद भी नई हूं।``

रजनीगंधा का सपना है कि वह यहां से सिलाई कढ़ाई सीख कर अपनी खुद की सिलाई की दुकान खोले। रजनीगंधा के हाथों मैला ढोने का काम `छूटने` के बाद अब उसका पति भी किसी और काम की तलाश में है ताकि इस घिनौने काम से मुक्त हो सकें।

रजनीगंधा उन 56 महिलाओं में से एक है जो अलवर में मैला ढोने का काम करती थीं और अब सुलभ से जुड़ चुकी हैं। मगर, अब उन्हें इस काम से मुक्ति मिल चुकी है। अब उनसे अछूतों जैसा व्यवहार नहीं किया जाता। जो लोग कल तक उन्हें अपने घर में बिठाने को अपना अपमान मानते थे, वे अब उन्हें कुर्सी पर बिठा कर पूछते हैं कि तुम न्यूयंार्क कब जा रही हो। हां, यह सभी महिलाएं जुलाई में न्यूयॉर्क जा रही हैं जहां इन्हें सम्मानित किया जाना है। इसके लिए ये महिलाएं खासी तैयारी भी कर रही हैं। कभी अनपढ़ रही ये महिलाएं अब अंग्रेजी भाषा सीख रही हैं।

लगभग सौ साल पहले महात्मा गांधी ने बंगाल में हुई कांग्रेस की बैठक में वाल्मीकि समुदाय के लोगों की काम की परिस्थितियों और उनकी विवशताअों का मसला उठाया था। तब से आज तक एक पूरी सदी बीत चुकी है मगर एक कु-प्रथा है कि मिटती नहीं।

Tuesday, May 13, 2008

अब..?


बात है अधूरी सी
रात है स्याह गहरी सी

पीछे कुछ छूटता नहीं
साथ कुछ भी चलता नहीं

खामोशी है पैनी सी
उंगलियों को कुरेदती सी

बेचैनी सागर की लहरों सी
खुद को पत्थरों से ठोकती सी

अजीब सी बेकरारी है
नहीं, प्रेम नहीं,
कोई और ही सी महामारी है

रोशनी है कहीं-कहीं कौंधती सी
आस पास को चीरती भेदती सी
और मैं सिमटती सी
तलाशती हूं ``क्या हूं मैं अब?``

Tuesday, May 6, 2008

यादें-बातें



बचपन की कुछ यादें मील का पत्थर होती हैं। उन पर से फिर फिर गुजरना भले ही न होता हो मगर वो कई बार विशालकाय पहाड़ सी यकायक सामने आ खड़ी होती हैं। ये पहाड़ धूप और कुहासे भी याद करवाते हैं और हरियाली और चांदनी भी। इंटरनेट पर काम के दौरान अचानक ही नीरज की एक मशहूर कविता की एक पंक्ति पर नजर पड़ गई। कुछ कौंंधा सा गया। पर काम ज्यादा था, और मुंआ समय भागे जा रहा था। हमें भी समय का पीछा करते हुए दौड़ना पड़ता है। न दौड़ें तो पिछड़ जाएं। हम भी, और हमारा काम भी।
खैर। नीरज की ये पंक्तियां - कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है- मुझे उस दौर में दु्रत गति में ले जाती हैं जो कई साल पहले करनाल में जिया था। तब कोई खिलौना टूट जाने पर ये पंक्तियां भावविभोर हो कर गा कर मुझे सुनाई जातीं। मां बाजार नहीं ले जातीं और कई दिन से कुल्फी खाने की इच्छा को मन में संजोए रखे इस सपने के टूट जाने पर मैं रूंआसी हो उठती तो भी मुझे गोद में झुलाते हुए वे यही कहते। वे यानी मेरे पापा।

छिपछिप अश्रु बहाने वालों
मोती व्यर्थ लुटाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से
जीवन नहीं मरा करता है।

सपना क्या है नयन सेज पर
सोई हुई आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी।

गीली उमर बनाने वालों
डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से
सावन नहीं मरा करता है।

माला बिखर गई तो क्या है
खुद ही हल हो गई समस्‍या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या।

रूठे दिवस मनाने वालों
फ़टी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से
आँगन नहीं मरा करता है।

लाखों बार गगरियाँ फ़ूटीं
शिकन न आई पर पनघट पर
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं
चहलण्पहल वो ही है तट पर।

तम की उमर बढ़ाने वालों
लौ की आयु घटाने वालों
लाख करे पतझड़ कोशिश पर
उपवन नहीं मरा करता है।

लूट लिया माली ने उपवन
लुटी न लेकिन गंध फ़ूल की
तूफ़ानों तक ने छेड़ा पर
खिड़की बंद न हुई धूल की।

नफ़रत गले लगाने वालों
सब पर धूल उड़ाने वालों
कुछ मुखड़ों की नाराज़ी से
दर्पण नहीं मरा करता है।

Podcast: सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविताओं का मेरा पॉडकास्ट

  हिन्दी के मशहूर कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविताओं को मैंने न्यूज18 हिन्दी के लिए पढ़ा था. यहां मैं पहली बार अपना हिन्दी पॉडकास्ट पोस्ट...