Thursday, July 9, 2009

कलाकार से स्टार बनने तक

फिल्म न्यू यॉर्क देखिए।

जॉन अब्राहम की जिस्म के बाद की अच्छी एक्टिंग के कुछ दृश्यों के लिए नहीं। कटरीना कैफ की एक्टिंग की कोशिश के लिए भी नहीं। इरफान की मजेदार एक्टिंग के लिए भी नहीं।

फिल्म देखिए एक किरदार के लिए जिसका नाम है नवाबुद्दीन। यह किरदार जिसने निभाया है, मुझे उसका नाम नहीं मालूम। वह तीन दृश्यों में है। पहले दृश्य में क्लोज अप कैमरा सीक्वेंस में वह एफबीआई द्रारा उसके साथ की गई ज्यादतियों के बारे में कटरीना कैफ को बता रहा है। केवल चेहरा। काला चमकता और हर शब्द के हर अक्षर के साथ कांपता चेहरा। कांपते होंठों से बेहतरीन डॉयलॉग डिलीवरी वाकई नवाबुद्दीन के अभिनय की कारीगरी है। कुछ पलों में ही इस करेक्टर ने अपनी छाप छोड़ दीहै। दूसरे दृश्य में वह कटरीना के साथ कार में है जहां उसने अच्छा अभिनय किया है। तीसरे दृश्य में ब्रिटिश पुलिस ऑफिसर की हत्या के बाद आत्महत्या का दृश्य भी चंद पलों का ही है।

न्यू यॉर्क देख कर ऐसा महसूस होता है कि अक्सर स्टार कलाकार नहीं बन पाता। हर कलाकार भी स्टार नहीं बन पाता। पर, कभी कभी कोई कलाकार हर स्टार पर भारी पड़ता है। इस फिल्म में वह कलाकार है नवाबुद्दीन का अभिनय करने वाला अभिनेता।

Thursday, June 25, 2009

खेल खेल में





खेल खेल में अजब खेल कर जाता है आदमी,
खेल खेल में खेल बन जाता है आदमी।

खेल खेल में खेल सिर्फ खेला नहीं जाता,
खेल की किसी बात को झेला नहीं जाता।

खेल में जिंदगी खेलनुमा हो जाती है,
खेल में भूल कभी खाली नहीं जाती है।

खेल में खिलाड़ी छुपे हुए होते हैं,
खेल में दांव शतरंज से चालबाज होते हैं।

खेल वही असल है, जिसका कोई नाम नहीं होता।
इसलिए इस खेल में खुद को खो देता है आदमी।

आज जो खेल कर दांव जीत जाता है,
कल वही खिलाड़ी औंधे मुंह की खाता है।

यहां नहीं कभी खेल का अंत होता,
आदमी मर जाता है, पर खेल चलता जाता है।

खेल में खिलाड़ी का चेहरा नहीं होता,
यहां कोई टीम, कोई मोहरा नहीं होता।

यहां बस आदमी बस आदमी से खेलता है,
यहां कोई रेफरी कोई कोच नहीं होता।

खेल में इंसान और हैवान सब एक हैं,
खेल में मुखौटे कुछेक नहीं, अनेक हैं।

खेल से तंग आकर, खेल फिर खेलता है आदमी।
खेल में फिर खुद ही खेल बनता है आदमी।

खेल एक नाटक है, खेल एक सच्चाई भी।
खेल की हर शाम पर किताब लिखता है आदमी।

खेल में जो हारा हो, लाओ कोई आदमी।
खेल में जो हारता है, जीता नहीं आदमी।

खेल की अवधि, उम्र जितनी लंबी है।
इसलिए, मौत से पहले हारता नहीं आदमी।

लाओ कोई जिंदा शख्स, जो खेल कर हारा हो,
खेल जब तक चालू है, बस खिलाड़ी है हर आदमी।

Thursday, May 14, 2009

इतिश्री

...इस बीच श्रीलंका सरकार ने अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की अपील ठुकारते हुए तमिल विद्रोहियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई रोकने से इनकार कर दिया है..

यह खबर अभी अभी पढ़ी बीबीसीहिंदी पर। तो श्रीलंका सरकार ने विद्रोहियों के खिलाफ ताबड़तोड़ गोलीबारी का सिलसिला न रोकने का फैसला लिया है। सीधे कटु शब्दों में कहें तो सरकार ने हत्याओं का सिलसिला जारी रखने का फैसला लिया है। हत्याएं किनकी...? जो मर रहे हैं वे कौन हैं? जो आम लोग सरकार के नियंत्रण वाले एरिया में आने की कोशिश कर रहे थे, उनमें से भी कई या अधिकांश मारे गए। जो बचे उन्हें तमिल विद्रोही मार रहे हैं। लिट्टे के निशाने पर सरकार है और सरकार के निशाने पर लिट्टे। इन दोनों के बीच वे लोग हैं जो बस जीना चाहते हैं। दरअसल मैंने देखा है कि जो जीना भर चाहते हैं वे ही जी नहीं पाते हैं। जो मारने की तमन्नाएं और आरजूएं अपने इर्द गिर्द लपेटे सांय सांय पसरते चलते हैं वे ही जी पाते हैं। बस जीना भर चाह लेने वाले लोग हर देश हर काल में मरते ही हैं, अक्सर कुत्ते की मौत। श्रीलंका में किसका किसके खिलाफ संघर्ष है ये? क्या श्रीलंका सरकार यह मान कर बैठी है कि एक बार लिट्टे का 'सिर कुचल दिया जाएगा' तो वे दोबार सिर नहीं उठाएंगे? क्या यह खुद को दिया गया एक छलावा नहीं होता? क्या दबा कर आग को वाकई बुझाया जा सकता है? दबी चिंगारी मौका पड़ते ही जलजला नहीं लाएगी, कौन कह सकता है? फिर समाधान क्या है? यह अनवरत हिंसा...तो कतई नहीं।

सरकार नामक संस्था का हथियार उठाना क्या हमेशा सही होता है? सरकार के खिलाफ विद्रोह क्या हमेशा गलत होता है? क्या हिंसा कभी भी सही ठहराई जा सकती है? क्या हिंसा कोई समाधान है? जो मर रहे हैं, मेरे कुछ नहीं लगते। आपके भी नहीं लगते। पर क्या इतने भर से चुप रह जाना न्यायसंगत हो जाता है...? पर एक अच्छे इंसान की तरह मरने वालों(लिट्टे और सरकारी सेना के इंसानों) की आत्मा के लिए शांति मांग कर चलिए इतिश्री कर ली जाए...। सुबह काम पर जाना है।

Tuesday, May 5, 2009

बस बात-1





ईश्वर

तुम से अब प्यार नहीं रहा
और इसलिए तुमसे लाज शरम भी नहीं बची
डर तो तुमसे कभी लगा ही नहीं
पर अब तुमसे रिश्ता टूट सा रहा है

लग रहा है
तुम वाकई सर्वोपरि हो

इतने सर्वोपरि कि तुम तक संवेदनाएं पहुंचती ही नहीं
कि तुम आकाश नहीं हो जहां विज्ञान पहुंचे
न ही भाव हो कि पहुंचे किसी कवि की कल्पना
या किसी की आस्था

न ही कोई आवाज पहुंचे
न ही कोई आभास पहुंचे तुम तक

इतना दूर हो
इतने मायावी
कि तुम्हारा न होना जीवन में
ज्यादा फर्क पैदा नहीं करेगा...

यही समझ कर अब
तुमसे प्यार नहीं रहा
और इसलिए तुमसे लाज शरम भी नहीं बची
डर तो तुमसे कभी लगा ही नहीं
पर अब तुमसे रिश्ता टूट सा रहा है

अब तुम मेरे दायरे में नहीं रहे
और कौन जानें तुम्हारे दायरे के नियमकानून क्या हैं
और इन तमाम शक शुबहाओं के साथ
ईश्वर
तुम से अब प्यार नहीं रहा

और इसीलिए ईश्वर अब मैं सिर्फ मैं हो गई हूं

शायद एक व्यक्ति का मैं हो जाना सचमुच जरूरी है...
खड़े हो सकने के लिए कुछ आस्थाओं का टूट जाना जरूरी है।

Saturday, January 31, 2009

साक्षी



कविता मां के ब्लॉग से ली है। पंक्तियां कैसी सच्चाई बोल जाती हैं! मां का ब्लॉग यादों और अनुभवों का ऐसा पुलिंदा है जिसे कागज दर कागज अनुराग अन्वेषी ब्लॉग पर चढ़ा रहे हैं। ...एक अजन्मे सुख के लिए मरना नादानी है...


जिस अग्नि को साक्षी मान कर
शपथ लेते हैं लोग,
उस पर ठंडी राख की परतें
जम जाती हैं।
मन की गलियों में
भटकती हैं तृष्णाएं।
मगर इस अंधी दौड़ में
कोई पुरस्कार नहीं।

उम्र की ढलती चट्टान पर
सुनहरे केशों की माला
टूटती है।
आंखों का सन्नाटा
पर्वोल्लास का सुख
नहीं पहुंचाता।
मगर एक अजन्मे सुख के लिए
मरना नादानी है,
जिंदगी भंवर में उतरती
नाव की कहानी है।

Podcast: सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविताओं का मेरा पॉडकास्ट

  हिन्दी के मशहूर कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविताओं को मैंने न्यूज18 हिन्दी के लिए पढ़ा था. यहां मैं पहली बार अपना हिन्दी पॉडकास्ट पोस्ट...