शब्दों के पैरों से घुंघरू बंधे हैं
कभी कभी कानों में शोर सा भरते हैं
ढांप लो हथेलियों से
कान को अगर कभी
तो चमड़ी पे तेज की थाप से बजते हैं
और कभी चमड़ी को
नोंच लो खुरच भी लो
तेज रोशनी बनके शब्द
आंखों में उतरते हैं
क्या करोगे नजर जब शब्द से ढकी होगी
क्या करोगे पांव जब शब्द से अटे होंगे
क्या करोगे सांस जब शब्द से सनी होगी
क्या करोगे शब्द जब मौन बन चीखेंगे..
चुनना तो है कि
कैसे शब्द को पचाना है
न पचे तो अपच सी
कर देते हैं घुंघर से शब्द
फिर कभी एक दिन मीरा के श्याम बन
नैया के खिवैया भी बनते हैं
यही शब्द
पर यकीन हो चला
शोर गजब ढाते हैं
आसमान गिरा रे गिरा
फिर फिर गरियाते हैं
शब्दों के पैरों से घुंघरू बंधे हैं
कभी कभी कानों में शोर सा भरते हैं
पीले नीले सफेद और भूरे लाल से
रंगीन कोई इंद्रधनुष है
सरगम की कल्पना..या फिर?
कौन जाने क्या बला है
पर यकीन तो हो चला है
बार बार धरती से खिसकते हैं यही शब्द
रहें तो रहें, या न रहें
बसें तो बसें, या न बसें
बजें तो बजें, या न बजें
या सदा बने ही रहें
पर कभी निजात दें
और कभी बता भी दें
क्या है अमीबा सा जो
खुद पे इतराते हैं
शब्दों के पैरों से 'सुनहरे' घुंघरू बंधे हैं...
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4 comments:
बहुत सूक्ष्म और बेहतरीन रचना
मै यह सोचकर पढ़ गया कि किसी वैज्ञानिक विषय पर कविता होगी खैर ..कुछ रचने का प्रयास तो है अमीबा से विकसित इस संरचना में ।
सुन्दर भाव!
सराहनीय कविता और सोच.
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