Friday, July 11, 2008

तमाशे की एक नई हद?


वासना के जुनून में मारा गया आरुषि तलवार को? बदला लेने के लिए आरुषि का कत्ल किया गया? घरेलू नौकर हेमराज ने मारा उसे? पिता राजेश तलवार ने अवैध संबंधों में बाधा बनने पर मारा आरुषि को? आरुषि का चरित्र ही खराब था...? आदि इत्यादि।

एक नई कहानी (?) कल रात से इलेक्ट्रानिक और आज सुबह से प्रिंट मीडिया में छाई पड़ी है। मीडिया वाले `ऐलान` कर रहे हैं कि मामला सुलट गया है, हत्या तो हुई ही, रेप भी हुआ था, सब नौकरों का किया धरा था, अडो़स पड़ोस के नौकरों के साथ मिल कर इस कत्ल को अंजाम दिया गया। एक चैनल के पास तो बाकायदा वह टेप है जो सीबीआई से किसी तरह उसने हासिल कर लिया है। यह टेप उन सवाल- जवाबो का ब्यौरा है जो नाकोZ टेस्ट के दौरान राजकुमार से पूछे गए। एकता कपूर के घटिया नाटकों की तरह नित नए खुलासे हो रहे हैं। एक गंभीर अपराध पर नौटंकी हो रही है। इस नौटंकी का सूत्रधार बन कर उभर रहा है मीडिया। इसमें मजा कौन ले रहा है, यह तो मेरी अल्पबुिद्ध में आता नहीं। मगर, कच्चा माल पुलिस मुहैया करवाती रही और अब सीबीआई के कथित सूत्र करवा रहे हैं।


अभी तक इस बाबत किसी सीबीआई प्रवक्ता का बयान नहीं आया है मगर हर ओर `कातिल का खुलासा` होने की खबरें आने लगी हैं। क्या यह एक नया तमाशा है? आरुषि के मर्डर केस में रेप शब्द भी जुड़ चुका है। किसी तिलिस्मी कहानी या सीग्रेड फिल्मों की तरह इस सारे मामले को डील किया जा रहा है मीडिया द्वारा। संवदेना को भुनाने की प्रक्रिया अपने आप में संवदेनहीनता की पराकाष्ठा है। न जाने किस आधार पर पिता राजेश तलवार को बेटी आरुषि का हत्यारा करार दिया गया। संदेहों को विश्वास में बदल दिया गया और ऐसा माहौल बनाया गया कि लगा संपूर्ण समाज रसातल में जा रहाहै...बचोरे।

ऐसा नहीं कि मीडिया अपनी भूमिका गंभीरता से कभी भी नहीं निभाता है। मगर क्राइम और देह की बात आते ही, उसका बावलापन और उतावलापन उसके विवेक पर हावी हो जाता है। अपने होने के औचित्य को ताक पर रखते हुए वह सनसनी ही जीता है, सनसनी ही पीता है और सनसनी ही परोसता है। बिना कुछ सोचे समझे आरुषि के चरित्र को ही हीनता की श्रेणी में रख दिया गया। चौदह साल की बेटी को पापा के अवैध संबंधों का साक्षी करार दे दिया गया। पिता कितना भी जलील या निर्दयी क्यों न हो, कुछ खास समुदायों या प्रांतों को छोड़ दें तो उसके बेटी की हत्या करने की बात भी आराम से गले के नीचे नहीं उतरती। मगर, इस मामले में भौचक्के अंदाज में गलप की जाती रही। लोगों द्वारा भी, टीवी चैनलों द्वारा भी और अपने आप को सनसनी से दूर मान कर रिअल पत्रकारिता करने का दंभ भरने वाले प्रिंंट मीडिया के भी।

मगर इस सबमें असल मुद्दा हमेशा की तरह गायब! आरुषि कांड की सच्चाई पता नहीं कब आएगी, मगर जो माहौल बन चुका है और जिस तरह के दबाव बन रहे हैं, डर है कहीं सच भीतर ही दफन न हो जाए। कहीं ऐसा न हो कि जो सामने आए, वह सच का मुखौटा पहने झूठ हो।.........

2 comments:

Chhindwara chhavi said...

अरूषि - हेमराज का कांड ....
खुलासा ...
अगर जो सामने आया है वहीं सही है तो ...
बहुत ही ग़लत है ...

अरूषि और हेमराज का कत्ल अगर अपनी गलती ...
गुनाह को दुनिया से छिपाने के लिए किया गया है ...
तो यह यकीं करने लायक बात नहीं है ...

जरूर कोई बड़ी वज़ह है ...

Amit K Sagar said...

उत्तम. गहरी पैठ. यधपि मैं आपसे कुछ जानना चौंगा; आपको इन सब सवालों के पीछे क्या अहम् कारण लगते हैं व् निवारण क्या हो सकता है!
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लिखते रहिये...ये मेरी व्यक्तिगत सोच व् भावः है...चूँकि दम है ' शुभकामनायें.
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