Thursday, July 10, 2008

दिल्ली मेरी दिल्ली


सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी गौरतलब है। कोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बाहरी लोगों के बोझ से चरमराने पर सरकार को संज्ञान लेने के लिए कहा है। अदालत की इस टिप्पणी पर कुछ लोग खुश हैं जबकि कुछ बेहद नाराज भी।

कोर्ट ने कहा है कि यह सही है कि किसी भी व्यक्ति को देश में कहींं भी बसने का अधिकार है मगर इस बाबत यह ध्यान रखने की भी जरूरत है कि संसाधनों पर बोझ न बढ़े और मूलभूल सरंचना न चरमराए। कोर्ट ने अपनी बात स्पष्ट और बेहद स्पष्ट शब्दों में कही है। जाहिर है कोर्ट किसी के भी आवागमन से ले कर बसने के अधिकार को बाधित नहीं करता बल्कि इस अधिकार को थोड़ा और ध्यान रखता है। कोर्ट की टिप्पणी लोगों के `ढंग` से रहने के अधिकार को भी सुनिश्चित करने की जरूरत पर बल देती है।

यहां यह स्पष्ट होना जरूरी है कि यहां बिहारियों या यूपी वालों को खेदड़ने की बात अदालत ने नहीं कही है और किसी जाति, प्रदेश या समुदाय के आधार पर दिल्ली को भीड़मुक्त करने की बात भी नहीं कही है। संसाधनों पर बढ़ते बोझ और चरमराती व्यवस्था को चलायमान रखने की जरूरत पर संजीदगी से अपनी बात कही है। अब यह सरकार पर है कि वह इस बाबत दिए गए निर्देशों को कैसी और कितनी गंभीरता से लेती है।

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