Tuesday, May 6, 2008

यादें-बातें



बचपन की कुछ यादें मील का पत्थर होती हैं। उन पर से फिर फिर गुजरना भले ही न होता हो मगर वो कई बार विशालकाय पहाड़ सी यकायक सामने आ खड़ी होती हैं। ये पहाड़ धूप और कुहासे भी याद करवाते हैं और हरियाली और चांदनी भी। इंटरनेट पर काम के दौरान अचानक ही नीरज की एक मशहूर कविता की एक पंक्ति पर नजर पड़ गई। कुछ कौंंधा सा गया। पर काम ज्यादा था, और मुंआ समय भागे जा रहा था। हमें भी समय का पीछा करते हुए दौड़ना पड़ता है। न दौड़ें तो पिछड़ जाएं। हम भी, और हमारा काम भी।
खैर। नीरज की ये पंक्तियां - कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है- मुझे उस दौर में दु्रत गति में ले जाती हैं जो कई साल पहले करनाल में जिया था। तब कोई खिलौना टूट जाने पर ये पंक्तियां भावविभोर हो कर गा कर मुझे सुनाई जातीं। मां बाजार नहीं ले जातीं और कई दिन से कुल्फी खाने की इच्छा को मन में संजोए रखे इस सपने के टूट जाने पर मैं रूंआसी हो उठती तो भी मुझे गोद में झुलाते हुए वे यही कहते। वे यानी मेरे पापा।

छिपछिप अश्रु बहाने वालों
मोती व्यर्थ लुटाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से
जीवन नहीं मरा करता है।

सपना क्या है नयन सेज पर
सोई हुई आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी।

गीली उमर बनाने वालों
डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से
सावन नहीं मरा करता है।

माला बिखर गई तो क्या है
खुद ही हल हो गई समस्‍या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या।

रूठे दिवस मनाने वालों
फ़टी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से
आँगन नहीं मरा करता है।

लाखों बार गगरियाँ फ़ूटीं
शिकन न आई पर पनघट पर
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं
चहलण्पहल वो ही है तट पर।

तम की उमर बढ़ाने वालों
लौ की आयु घटाने वालों
लाख करे पतझड़ कोशिश पर
उपवन नहीं मरा करता है।

लूट लिया माली ने उपवन
लुटी न लेकिन गंध फ़ूल की
तूफ़ानों तक ने छेड़ा पर
खिड़की बंद न हुई धूल की।

नफ़रत गले लगाने वालों
सब पर धूल उड़ाने वालों
कुछ मुखड़ों की नाराज़ी से
दर्पण नहीं मरा करता है।

1 comment:

Unknown said...

बहुत प्रेरक और संवेदनशील प्रस्तुति है। इतनी बढिया कविता पढवाने के लिए शुक्रिया। -ललित

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